Sunday, 5 January 2014

कंही ऐसा तो नही कि अरविन्द केजरीवाल जैसे ईमानदार और स्पष्टवादी व्यक्ति के साथ कुछ कुर्सी के लोभी और सत्ता के स्वार्थी लोग जुड़ गये हों क्योंकि जिस तरह से आप पार्टी से लोग जुड़ रहे हैं ऐसा फिल्मों में हो होता है कि मात्र तीन घंटे में ही सब कुछ देखने को मिल जाये। मानता हूँ कि भारत को बदलाव की जरूरत है पर अभी वक़्त इतना भी ख़राब नही आया कि क्रांति हो जाये क्योंकि आज मैं सोच रहा था कि क्या भारत में जितने लोग अब केजरीवाल से जुड़ रहे है वो वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं या ये बस एक सुपरहिट फ़िल्म की  लहर हैं।
दरसल आज मेरे इस कमेंट से कुछ लोग जरूर ही चकित होंगे क्योंकि बहुत  लोगो को लगता है कि मैं केजरीवाल का समर्थक हूँ -कुछ भी कहने से पहले मैं बताना चाहता हूँ कि मैं मोदी ,राहुल गांधी ,बीजेपी। कॉंग्रेस ,सपा ,बसपा किसी का भी समर्थक नही हूँ मैं तो एक आलोचक हूँ जो अच्छा लगता है अच्छा कहता हूँ जब तक अच्छा होता है तब तक कहता हूँ और बिलकुल निष्पक्ष कहता  हूँ क्योंकि मैं एक आम आदमी हूँ मुझे सत्ता का लालच नही इसलिए निडर कहता हूँ। सभी पाठक कृपया इसे राजनैतिक स्पर्श न दें।

दरसल अरविन्द जी जब चुनावी बिगुल लेकर रण क्षेत्र में उतरे थे तो वो एक जज्बा था एक जोश था एक हौंसला था और वो हौंसला यकींनन एक आम आदमीं में ही हो सकता है। जिस वक़्त केजरीवाल जी ने दिल्ली में झाड़ू लगाने का जिम्मा लिया था उस वक़्त मेरा सीना भी एक जोश से भर गया था और जब दिल्ली में चुनावी नतीजे आये थे तो रोमांचित हो गया था मानो  कि मेरी ही जीत हुई हो। और ये एहसास मुझे पहली बार नही बल्कि एक बार और हुआ था जब अखिलेश यादव जी एक युवा मुख्य मंत्री बने थे। तब भी मेरी आँखों ने सपने देखे थे कि कुछ तो बदला है  परन्तु नतीजा शुन्य निकला।

मैं अरविन्द जी और अखिलेश जी की तुलना नही कर रहा मैं तो अपने भाव बतला रहा हूँ। और मेरा विचार है कि आम आदमी पार्टी शायद अब कंही अपने मुद्दों से भटक तो नही रही है क्योंकि मुझे लगा था कि शायद इस पार्टी का गठन दिल्ली को ठीक ढर्रे पर लाने  को हुआ था और यही सोच कर दिल्ली कि जनता ने आप को इतना प्रबल वोट देकर विजयी भी बनाया था।

पर जिस दिन 'आप ' ने लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़ने की अभिलाशा दिखलाई है मुझे लगा कि क्या ये दिल्ली कि जनता से छल नही होगा। आम आदमी पार्टी को क्या पहले दिल्ली को बदलना नही चाहिए? क्या पूरे  देश के सामने एक बदलाव की तस्वीर नही पेश करनी चाहिए? क्योंकि आम आदमी पार्टी का एजेंडा जंहा तक मैं जनता था चुनाव लड़ना तो था ही नही वो तो ये कहते थे कि बीजेपी या कोंग्रेस ही ठीक कर दे सब कुछ हम खुद चुप हो जायेंगे। यकीनन मेरा पूरा भारत इस बदलाव कि आंधी को देखना चाहता था और शुरुआत दिल्ली से करना चाहता था। केजरीवाल जी हाथों में अब दिल्ली है मुझे लगता है कि उन्हें पहले दिल्ली को स्वर्ग बना देना चाहिए और यदि उन्होंने ऐसा किया तो यक़ीनन पूरे भारत का हर राज्य उनके परिवर्तन को स्वीकार करेगा। आप को फ़िलहाल दिल्ली पर ही ध्यान देना चाहिए था क्योंकि आप ने पहले दिल्ली ही मांगी थी। रही बात लोक सभा चुनावों की तो ये कौन सा इसी बार आयेंगे पांच साल बाद फिर आयेंगे। 'आप ' अभी इतनी जल्दी ही सब कुछ क्यों  पाना चाहते हैं ?

हमने अभी आपको दिल्ली दिया है क्या आप को पहले उसे हमारे दिल कि दिल्ली नही बना देना चाहिए?
कंही ऐसा तो नही कि आम आदमी पार्टी भी देश की एक और बड़ी पार्टी बन कर सामने आ जाये और मुझे डर है कंही अन्ना जी की वो बात '' सत्ता की ताकत का एक नशा होता है वो इतनी ऊँची कुर्सी है कि उससे ऊपर ही ऊपर दिखायी देता है, ताकत का नशा बहुत बुरा होता है '' ये बात सच न हो जाये।
जिस तरह से केजरीवाल जी ने जल्दबाज़ी में फैसले लिए है मुझे नही पता कि उनके पीछे क्या मजबूरी थी पर वो फैंसले कम से कम मुझे तो सत्ता की और जाने का एक रास्ता दिखाई दे रहे हैं और उन रास्तों पर चलते हुए 'आप' के काफिले से उड़ती हुई धूल में मुझे दिल्ली और आपके वादे थोड़े  धुंधले  दिखायी दे रहे हैं।
पाठकगण सम्भवतः मेरे विचारों से असंतुष्ट भी हो सकते हैं परन्तु ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं मैं आशा करता हूँ कि श्री केजरीवाल सर्वप्रथम दिल्ली की एक मिशाल पेश करें चुनाव तो आते ही रहेंगे जब देश को लगेगा कि अब वक़्त आ गया है तो देश खुद तुम्हे सिहांसन पर बैठा देगा।
आज मैं अरविन्द जी के लिए एक छोटी सी कविता भेंट कर रहा हूँ जो शायद मेरे जैसे हर एक आम आदमी के दिल से ही निकलेगी।

खुदको  ना  पेश कर ,बनके खुदा मेरा
मत थोप मुझपर ,हुस्न वाले ये हुनर तेरा
साबित गर तू कर सका ,तेरी शख्शियत को मेरे सामने
यकीन मान करूँगा दिल से  इबादत तेरी और सजदा तेरा।
पर उससे पहले खुदको  ना  पेश कर ,बनके खुदा मेरा।

अभी तो महज एक दिया जलाया है मैंने
मत सोच कि मैं हो गया बाशिंदा तेरा
मैं एक आदम हूँ यूँ ही कैसे करूँ एतबार तेरा
पहले कुछ वफ़ा करके तो दिखा ज़माने को मेरी खातिर
यकीन मान करूँगा दिल से  इबादत तेरी और सजदा तेरा।
पर उससे पहले खुदको  ना  पेश कर ,बनके खुदा मेरा।

ए.के.मलिक
५ जन. २०१४
रात्रि ८:४०